19 फरवरी को है मां नर्मदा जयंती जानिए मां नर्मदा नदी की उत्पत्ति और महत्व - Jai Bharat Express

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19 फरवरी को है मां नर्मदा जयंती जानिए मां नर्मदा नदी की उत्पत्ति और महत्व

 


नर्मदा उदगम मंदिर


अमरकंटक, विंध्य और सतपुड़ा पहाड़ियों की पर्वत श्रृंखला में स्थित एक छोटा सा गाँव है, जहाँ से नर्मदा नदी पहाड़ी से निकलती है |जिसे गाय के मुँह के आकार का बनाया गया है। ऐसा कहा जाता है कि यह मैकल, व्यास और ब्रिघू आदि ऋषि जैसे महान संतों के लिए ध्यान का स्थान था। नर्मदा मंदिर के निर्माण के बारे में कोई ठोस सबूत नहीं है। ऐतिहासिक प्रमाणों से पता चलता है कि यह कलचुरी द्वारा बारहवीं शताब्दी के आसपास बनाया गया था। नर्मदा उद्गम कुंड (नर्मदा का जन्म स्थान) रीवा नायक द्वारा बनाया गया था (उनकी मूर्ति सुराग देती है)। वर्षों बाद, नागपुर के राजा भोंसले ने नर्मदा मंदिर को आकार दिया, बाद में महारानी देवी अहिल्या ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। मंदिरों और देवी देवताओं की मूर्तियों के साथ मंदिरों का एक बड़ा परिसर मंदिर के चारों ओर बनाया गया है। एक हाथी और एक घोड़े की मूर्ति यहाँ पर रखी गयी है, जिस पर लखन और ऊदल की मूर्तियाँ रखी गई हैं, ऐसा मन जाता है की यह औरंगजेब के काल में क्षतिग्रस्त हुई थी|


19 फरवरी को है मां नर्मदा जयंती जानिए मां नर्मदा नदी की उत्पत्ति और महत्व

 
                 
श्री नर्मदाष्टकम

सबिंदु सिन्धु सुस्खल तरंग भंग रंजितम
द्विषत्सु पाप जात जात कारि वारि संयुतम
कृतान्त दूत काल भुत भीति हारि वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 1

त्वदम्बु लीन दीन मीन दिव्य सम्प्रदायकम
कलौ मलौघ भारहारि सर्वतीर्थ नायकं
सुमस्त्य कच्छ नक्र चक्र चक्रवाक् शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 2

महागभीर नीर पुर पापधुत भूतलं
ध्वनत समस्त पातकारि दरितापदाचलम
जगल्ल्ये महाभये मृकुंडूसूनु हर्म्यदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 3

गतं तदैव में भयं त्वदम्बु वीक्षितम यदा
मृकुंडूसूनु शौनका सुरारी सेवी सर्वदा
पुनर्भवाब्धि जन्मजं भवाब्धि दुःख वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 4

अलक्षलक्ष किन्न रामरासुरादी पूजितं
सुलक्ष नीर तीर धीर पक्षीलक्ष कुजितम
वशिष्ठशिष्ट पिप्पलाद कर्दमादि शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 5

सनत्कुमार नाचिकेत कश्यपात्रि षटपदै
धृतम स्वकीय मानषेशु नारदादि षटपदै:
रविन्दु रन्ति देवदेव राजकर्म शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 6

अलक्षलक्ष लक्षपाप लक्ष सार सायुधं
ततस्तु जीवजंतु तंतु भुक्तिमुक्ति दायकं
विरन्ची विष्णु शंकरं स्वकीयधाम वर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 7

अहोमृतम श्रुवन श्रुतम महेषकेश जातटे
किरात सूत वाड़वेषु पण्डिते शठे नटे
दुरंत पाप ताप हारि सर्वजंतु शर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे 8

इदन्तु नर्मदाष्टकम त्रिकलामेव ये सदा
पठन्ति ते निरंतरम न यान्ति दुर्गतिम कदा
सुलभ्य देव दुर्लभं महेशधाम गौरवम
पुनर्भवा नरा न वै त्रिलोकयंती रौरवम 9

त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
नमामि देवी नर्मदे, नमामि देवी नर्मदे
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे


कहा जाता है कि भगवान शिव ने देवताओं को उनके पाप धोने के लिए माँ नर्मदा को उत्पन्न किया था और इसलिए इसके पवित्र जल में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते है।


19 फरवरी 2021 को मां नर्मदा जयंती है। वैसे तो नर्मदा जयंती का महत्त्व पूरे देश में है किन्तु मां नर्मदा का उद्गम स्थल अमरकंटक मध्यप्रदेश में स्थित होने के कारण यह पर्व मध्यप्रदेशवासियों के लिए विशेष महत्त्व रखता है। पूरे प्रदेश में नर्मदा-जयंती बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है। खासकर नर्मदा तटों पर बसे शहर होशंगाबाद (नर्मदापुर) महेश्वर, अमरकण्टक, ओंकारेश्वर आदि। 

नर्मदा जयंती शुक्रवार, फरवरी 19, 2021 को 


सप्तमी तिथि प्रारंभ : फरवरी 18, 2021 को सुबह 08:17 बजे


सप्तमी तिथि समाप्त : फरवरी 19, 2021 को सुबह 10:58 बजे

इस दिन प्रात: काल मां नर्मदा का पूजन अर्चन एवं अभिषेक प्रारंभ हो जाता है। सायंकाल नर्मदा तटों पर दीपदान कर दीपमालिकाएं सजाई जाती हैं। ग्रामीण एंव शहरी अंचलों में भंडारे व भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि पूरे विश्व में मां नर्मदा ही एकमात्र ऐसी नदी हैं जिनकी परिक्रमा की जाती है।



जानिए मां नर्मदा की उत्पत्ति कैसे हुई । 

नर्मदा नदी के जन्म व उदगम का इतिहास व महत्त्व (Narmada River History and importance in hindi) 


एक बार देवताओं ने अंधकासुर नाम के राक्षस का विनाश किया, उस समय उस राक्षस का वध करते हुए देवताओं ने बहुत से पाप भी किये, जिसके चलते देवता, भगवान् विष्णु और ब्रम्हा जी सभी, भगवान शिव के पास गए उस समय भगवान शिव आराधना में लीन थे। देवताओं ने उनसे अनुरोध किया कि हे प्रभु राक्षसों का वध करने के दौरान हमसे बहुत पाप हुए है, हमें उन पापों का नाश करने के लिए कोई मार्ग बताइए, तब भगवान् शिव ने अपनी आँखें खोली और उनकी भौए से एक प्रकाशमय बिंदु पृथ्वी पर अमरकंटक के मैखल पर्वत पर गिरा जिससे एक कन्या ने जन्म लिया। वह बहुत ही रूपवान थी, इसलिए भगवान विष्णु और देवताओं ने उसका नाम नर्मदा रखा। इस तरह भगवान शिव द्वारा नर्मदा नदी को पापों के धोने के लिए उत्पन्न किया गया।

इसके अलावा उत्तर वाहिनी गंगा के तट पर नर्मदा ने कई सालों तक भगवान् शिव की आराधना की, भगवान् शिव उनकी आराधना से प्रसन्न हुए तभी माँ नर्मदा ने उनसे ऐसे वरदान प्राप्त किये, जो किसी और नदियों के पास नहीं है, वे वरदान यह थे कि – मेरा नाश किसी भी प्रकार की परिस्थिति में न हो चाहे प्रलय भी क्यों न आ जाये, मैं पृथ्वी पर एक मात्र ऐसी नदी रहूँ जो पापों का नाश करे, मेरा हर एक पत्थर बिना किसी प्राण प्रतिष्ठा के पूजा जाये, मेरे तट पर सभी देव और देवताओं का निवास रहे ।आदि इस कारण नर्मदा नदी का कभी विनाश नही हुआ, यह सभी के पापों को हरने वाली नदी है, इस नदी के पत्थरों को शिवलिंग के रूप में विराजमान किया जाता है, इसका बहुत अधिक मह्त्व है और इसके तट पर देवताओं का निवास होने से कहा जाता है कि इसके दर्शन मात्र से ही पापों का विनाश हो जाता है


 


भगवान शिव की सोमकला से उद्भव होने के कारण मां नर्मदा को सोमोभ्द्वा एवं मेकल पर्वत अमरकंटक से उद्गम होने के कारण मेकलसुता के नाम से भी जाना जाता है, अपने चंचल आवेग के कारण इनका रेवा नाम भी प्रसिद्ध है, ऋषि वशिष्ठ के अनुसार मां नर्मदा का प्राकट्य माघ शुक्ल सप्तमी, अश्विनी नक्षत्र, मकराशिगत सूर्य, रविवार के दिन हुआ था। अत: इसी दिन मां नर्मदा के जन्मोत्सव के रूप में नर्मदा-जयंती मनाई जाती है।


जानिए मां नर्मदा का महत्व

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदा सिन्दु कावेरी जलेस्मित सन्निधिकुरू:॥ के कथनानुसार मां नर्मदा सात पवित्र नदियों में से एक हैं। जिनके दर्शन मात्र से पुण्यफल प्राप्त होता है। शास्त्र का वचन है 


त्रिभि: सारस्वतं पुण्यं सप्ताहेन तु यामुनम।


सद्य: पुनाति गांग्गेय दर्शनादेव नर्मदा॥ 

अर्थात् सरस्वती का जल तीन दिन में, यमुना का जल एक सप्ताह में, गंगाजल स्नान करते ही पवित्र करता है किन्तु मां नर्मदा के जल का दर्शन मात्र ही पवित्र करने वाला होता है। कलियुग में मां नर्मदा के दर्शन मात्र से तीन जन्म के और नर्मदा स्नान से हजार जन्मों के पापों की निवृत्ति होती है।


शास्त्र के वचानुसार मां गंगा हरिद्वार में मां सरस्वती कुरूक्षेत्र में मां यमुना ब्रजक्षेत्र में अधिक पुण्यदायिनी है किन्तु मां नर्मदा सर्वत्र पूजित व पुण्यमयी हैं। शास्त्रानुसार सप्त कल्पक्षये क्षीणे न मृता तेन नर्मदा प्रलयकाल में समस्त सागर व नदियां नष्ट हो जाती हैं किन्तु मां नर्मदा  अपने नामानुसार कभी भी नष्ट नहीं होती हैं।

नर्मदा जन्म की कुछ कथायें 

कथा 1: एक कथा के अनुसार कहा जाता है कि एक बार भगवान् शिव (ब्रम्हांड के विनाशक), घोर आराधना में लीन थे, जिससे उनके शरीर से पसीना निकलने लगा, वह एक नदी के रूप में बहने लगा और वही नदी नर्मदा बनी।

कथा 2 : एक बार ब्रम्हा जी (ब्रम्हांड के निर्माता) किसी बात से दुखी थे, तभी उनके आंसुओं की 2 बूँद गिरी, जिससे 2 नदियों का जन्म हुआ, एक नर्मदा और दूसरी सोन. इसके अलावा नर्मदा पूराण में इनके रेवा कहे जाने के बारे में भी बताया गया है।                                                        नर्मदा जन्मोत्सव के कुछ मनोहारी दृश्य अमरकंटक से

 




इस पावन अवसर पर नर्मदा उद्गम स्थल को भव्य रूप से सजाया गया है।