हिंदू धर्म में क्यों पीले रंग को दिया जाता खास महत्व? - Jai Bharat Express

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हिंदू धर्म में क्यों पीले रंग को दिया जाता खास महत्व?



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यूं तो धार्मिक शास्त्रों में कई रंगों के अहमियत दी गई है, मगर हम आज बात करेंगे केवल पीले रंग के बारे में। जी हां, आप में से अक्सर देखा सुना होगा कि पीले रंग को धार्मिक दृष्टि से देखता जाता है। मगर ऐसा क्यों हैं? क्यों इस रंग को इतना खासा माना जाता? इस बारे में आज भी लगभग लोग अंजान ही हैं। तो आइए हम आपको बताते हैं पीले रंग का हिंदू धर्म में महत्व।

धार्मिक शास्त्रों के अनुसार पीले रंग को पितांबर भी कहा जाता है। कहा जाता हैै पीले रंग नवग्रह के गुरु ग्रह से संबंध रखता है। यही कारण है कि लोग खासतौर पर गुरुवार के दिन पीले वस्त्र धारण करते हैं। गुरु ग्रह भाग्य को जागृत करने वाला ग्रह माना जाता है। ज्योतिषी बताते हैं जिस किसी व्यक्ति के जीवन में निराशा के बादल छा जाएं, तो उस व्यक्ति का मन या तो संन्यास की ओर या आत्महत्या की ओर अग्रसर होने लगता है। निराशा असल में दो तरह की होती है, एक संन्यासी की जिसमें वैराग्य भाव जाग्रत होता है मृत्य एक सत्य है यह जानकर। धार्मिक दृष्टि से पीला रंग वैराग्य का भी प्रतीक माना जाता है। जब पतझड़ आता है तो पत्ते पीले पड़ जाते हैं। दूसरी निराशा सांसारी की होती है जो जीवन में किसी मोर्चे पर असफल हो जाता है। अत: हर संसारी के लिए प्रसन्नता और उत्साह जरूरी है तभी वह उन्नति प्राप्त कर सकता है।

इसके अलावा कहा जाता है कि किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य में पीले रंग का इस्तेमाल किया जाना शुभ होता है। केसरिया या पीला रंग सूर्यदेव, मंगल और बृहस्पति जैसे ग्रहों का भी प्रतिनिधित्व करता है। यह रोशनी को भी दर्शाता है। अर्थात पीला रंग बहुत कुछ कहता है। अगर वैज्ञानिकों की मानें तो पीला रंग के उपयोग से हमारे रक्त में लाल और श्वेत कणिकाओं का विकास होता है। अर्थात रक्त में हिमोग्लोबिन बड़ने लगता है। इससे रक्त संचार बढ़ता है, थकान दूर होती है, पीले रंग के संपर्क में रहने से रक्त कणों के निर्माण की प्रक्रिया बढ़ती है। खास तौर पर सूजन, टॉन्सिल, मियादी बुखार, नाड़ी शूल, अपच, उल्टी, पीलिया, खूनी बवासीर, अनिद्रा और काली खांसी का नाश होता है।