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जबलपुर मेयर इन काउंसिल की बैठक में लिया गया निर्णय:लोकसभा चुनाव से पहले बदल सकता है जबलपुर का नाम, संकल्प हुआ पारित




जबलपुर मेयर इन काउंसिल की बैठक में लिया गया निर्णय जबलपुर होगा  जाबालिपुरम देखिए 👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻



मां नर्मदा की बहती हुई अविरल धारा, संगमरमर की वादियों का खूबसूरत नजारा सदियों से हैं....अगर बदला है तो सिर्फ नाम, जो त्रिपुरी, जाबालि पुरम और फिर बाद में जबलपुर हुआ।



MP - जबलपुर | बीजेपी की सरकार में शहरों के नाम बदलने का सिलसिला जारी है.. और BJP शासित प्रदेशों में कई शहरों के नाम बदल भी दिये गए है, बता दें की कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आये महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू ने जबलपुर की जनता का ध्यान अपनी ओर खींचने का प्रयास किया है, उन्होंने कहा की हमने जबलपुर का नाम बदलने का संकल्प लिया है। 



लोकसभा चुनाव भी सामने है। चंद दिनों बाद लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो जाएंगा, इसी बीच मध्यप्रदेश के जबलपुर से बड़ी खबर सामने आई है। जबलपुर का नाम बदलने का संकल्प पारित हो गया है।



बता दें की जबलपुर का नाम बदलकर ‘जाबालिपुरम’ करने का संकल्प पारित किया गया है.... मेयर इन काउंसिल की बैठक में ये निर्णय लिया गया है। पूर्व महापौर सुशीला सिंह के कार्यकाल में भी ये संकल्प पारित हुआ था, जिसके बाद जबलपुर का नाम बदलने का संकल्प एमआईसी ने फिर से पारित किया है।


जाबाली ऋषि की समाधि जबलपुर के नर्मदा तट पर स्थित जिलहरीघाट के प्रेमानंद आश्रम में स्थित है।



नर्मदा के तट पर बसे शहर जबलपुर को संस्कारों की नगरी कहा जाता है. यहां के प्राचीन घाटों पर पौराणिक कथाओं और परंपराओं दोनो का संगम देखने को मिलता है. यह नगरी कई महान तपस्वियों की तपो भूमि रही है, इन्हीं में एक ऐसे भी संत थे जिनके नाम पर इस शहर को अपनी पहचान मिली. हम बात कर रहे है महान तपस्वी संत जाबालि ऋषि जिनका पूरा नाम सत्यकाम जाबाल था. उन्होंने नर्मदा के तट पर कई वर्षों तक तपस्या की ओर यहीं समाधिस्थ भी हो गए।


मां नर्मदा की बहती हुई अविरल धारा, संगमरमर की वादियों का खूबसूरत नजारा सदियों से हैं. अगर बदला है तो सिर्फ नाम, जो त्रिपुरी, जाबालि पुरम और फिर बाद में जबलपुर. किसी भी शहर की बसाहट में जहां नदी प्रमुख स्थान रखती है शिव पुत्री मां नर्मदा में सभी देवी देवता वास करते है. गोंड शासकों के बाद इस क्षेत्र में मुगलों के बाद मराठा और फिर अंग्रेजों ने भी शासन किया, लेकिन इसकी पहचान हमेशा महर्षि जाबालि के नाम से ही रही. जिनका उल्लेख रामायण के साथ ही नौ पुराणों और महर्षि जाबालि द्वारा विरचित जाबालदर्शन उपनिषद, जाबालोपनिषद् और जाबाल उपनिषदों में मिलता है. इतना ही नहीं, कहा जाता है कि श्रीराम को वनवास छोड़ अयोध्या लौटने का आग्रह करने भरत संग जाबालि ऋषि भी गए थे. अयोध्या राजपरिवार में जाबालि ऋषि राजा दशरथ के मंत्री थे।





ऋषि जाबालि अथवा सत्यकाम जाबाला महर्षि गौतम के शिष्य थे, जिनकी माता का नाम जबाला था. इनकी कथा छांदोग्य उपनिषद में दी गई है. सत्यकाम जब ऋषि गौतम के पास गए तो नियमानुसार गौतम ने उनसे उनका गोत्र पूछा. सत्यकाम ने स्पष्ट कह दिया कि मुझे अपने गोत्र का पता नहीं, मेरी माता का नाम जबाला और मेरा नाम सत्यकाम है....मेरे पिता युवावस्था में ही मर गए और घर में नित्य अतिथियों के आधिक्य से माता को बहुत काम करना पड़ता था. इससे उन्हें इतना भी समय नहीं मिलता था कि वे पिता जी से उनका गोत्र पूछ सकतीं थी, गौतम ने शिष्य की इस सीधी सच्ची बात पर विश्वास करके सत्यकाम को ब्राह्मण पुत्र मान लिया और उसे शीघ्र ही पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो गई. उसी के बाद से वह ऋषि जाबलि के नाम से पूरे विश्व में विख्यात हो गए।