क्या फीका पड़ने लगा किसान आंदोलन, प्रदर्शनकारी किसानों की घटती संख्या से चिंतित संयुक्त किसान मोर्चा - Jai Bharat Express

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क्या फीका पड़ने लगा किसान आंदोलन, प्रदर्शनकारी किसानों की घटती संख्या से चिंतित संयुक्त किसान मोर्चा

 


तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को लेकर दिल्ली से सटे गाजीपुर, शाहजहांपुर, टीकरी और सिंघु बॉर्डर पर किसानों का प्रदर्शन चल रहा है। 26 मार्च को किसान आंदोलन को चार महीने पूरे होने वाले है। ऐसे में किसानों ने 26 मार्च को भारत बंद का आह्वान किया है। वहीं, दूसरी तरफ किसानों का प्रदर्शन फीका पड़ने लगा है। दिल्ली की सीमाओं पर जुटे किसानों की संख्या तेजी से घटती जा रही है। गाजीपुर, टीकरी और सिंघु बॉर्डर पर पहले की तुलना में प्रदर्शनकारी किसानों की संख्या बेहद कम है। किसान नेता राकेश टिकैत भी इस बात से हैरान हैं कि यूपी गेट पर किसान प्रदर्शनकारियों की संख्या 200 से भी नीचे आ गई है। टेंट भी उखड़ने लगे हैं। बताया जा रहा है कि 28 नवंबर को जब यूपी गेट पर किसानों का धरना-प्रदर्शन शुरू हुआ था तो यहां पर युवा हजारों की संख्या में धरनास्थल पर मौजूद थे। आलम यह था कि युवा मंच भी संभालते थे और धरनास्थल की सभी व्यवस्था युवाओं के हाथ में थीं। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष गौरव टिकैत भी अक्सर यहां पर पहुंचकर युवा प्रदर्शनकारियों में जोश भरते थे। तीन महीने बाद अब हालत यह है कि 26 जनवरी को दिल्ली में हुए उपद्रव के बाद युवा प्रदर्शनकारी धरनास्थल को छोड़कर चले गए। इनके वापस लौटने का सिलसिला अभी भी जारी है। धरनास्थल का मंच खाली दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में प्रदर्शनकारी नेताओं के माथे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा रही हैं।

धरना स्थल पर 10 महिलाएं भी मौजूद नहीं

कृषि कानून विरोधियों की ओर से सिंघु बॉर्डर पर धरना दिया जा रहा है। महिलाएं अब धरना स्थल पर दिखाई नहीं दे रही हैं। बुधवार को धरना स्थल पर 10 महिलाएं भी मौजूद नहीं थीं। धरना स्थल पर पंखे लगाने के बावजूद प्रदर्शनकारियों की संख्या बीते दो दिनों के मुकाबले कम देखने को मिली। प्रदर्शनकारी धरना स्थल पर कम और ट्रालियों में ज्यादा बैठे दिखे।

दरअसल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के बाद अब सिंघु बॉर्डर पर फिर से रौनक खत्म होती जा रही है। 8 मार्च को यहां पर भारी संख्या में महिलाएं पहुंचीं थीं, लेकिन अब वह वापस अपने घरों को लौट गई हैं। धरना स्थल पर उनकी संख्या न के बराबर हो गई है। प्रदर्शनकारियों की ओर से धरना स्थल पर भीड़ बढ़ाने के लिए पूरी कोशिश की जा रही है। कभी मुफ्त में गन्ने का जूस पिलाया जा रहा है तो कभी फ्री में आइसक्रीम बांटी जा रही है, बावजूद इसके एक- दो दिन रौनक के बाद फिर से वही सन्नाटा हो जा रहा है।

26 मार्च को किया भारत बंद का एलान, 28 को जलाएंगे तीनों कृषि कानूनों की प्रतियां

संयुक्त किसान मोर्चा के नेता बूटा सिंह बुर्जगिल ने बुधवार को कहा कि हम 26 मार्च को अपने आंदोलन के चार महीने पूरे होने के मौके पर पूर्ण रूप से भारत बंद का पालन करेंगे। शांतिपूर्ण बंद सुबह से शाम तक प्रभावी रहेगा। बंद के दौरान किसानों के ट्रैक्टर भी नहीं चलेंगे। बूटा सिंह ने बताया कि जिस तरह 8 मार्च को देशभर की महिलाओं ने सभी किसान आंदोलन स्थलों पर जुटकर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया, उसी तरह संयुक्त किसान मोर्चा ने 15 मार्च से 28 मार्च तक का अपना कार्यक्रम सुनिश्चित किया है। बूटा सिंह ने बताया कि जिन राज्यों में चुनाव हो रहे हैं या चुनाव होने वाले हैं वहां पर संयुक्त किसान मोर्चा अपने मंच लगाएगा और लोगों को बीजेपी के खिलाफ वोट देने की अपील करेगा।

संयुक्त किसान मोर्चा ने कुछ इस तरह तय किया है कार्यक्रम

- 15 मार्च को डीजल, पेट्रोल, गैस सिलिंडर की कीमत वृद्धि और रेलवे निजीकरण के खिलाफ प्रदर्शन होंगे। एसडीएम, डीसी को ज्ञापन दिया जाएगा।
- 17 मार्च को आल इंडिया ट्रेड यूनियन सिंघु बॉर्डर पर मीटिंग में हिस्सा लेंगे और भारत बंद पर फैसला करेंगे।
-19 मार्च को किसान खेती बचाओ-मंडी बचाओ दिवस मनाएंगे, सभी मंडियों में पहुंचकर प्रदर्शन में हिस्सा लेंगे।
- 23 मार्च को शहीदे आजम भगत सिंह का बलिदान दिवस मनाएंगे।
- 26 मार्च को किसान आंदोलन के चार महीना पूरा होने पर भारत बंद का आह्वान किया जा रहा है।
- 28 मार्च को होलिका दहन में पूरे भारत के अंदर तीनों कृषि कानूनों की प्रतियां जलाई जाएंगी।

26 जनवरी को दिल्ली में हुआ था हंगामा

बता दें कि किसान आंदोलन के बीच 26 जनवरी को राजधानी दिल्ली में जमकर हंगामा हुआ था। किसान यूनियन और पुलिस की बीच बैठकों के दौर के बाद गणतंत्र दिवस की ट्रैक्टर रैली निकाली गई थी जिसके लिए एक निर्धारित रूट तैयार किया गया था , लेकिन ट्रैक्टर रैली निर्धारित समय से पहले ही दिल्ली की सीमा में प्रवेश कर गई। तय रूट के अलावा भी किसानों के कई गुटों ने आईटीओ और लाल किले की ओर कूच कर दिया। सड़कों पर पुलिस और किसानों के बीच टकराव हुआ, हिंसा हुई और यहां तक कि लाल किले की प्रचीर पर किसानों का एक जत्था पहुंचा और वहां सिक्खों के धार्मिक झंडे को फहराया गया। आंदोलन में शामिल कुछ लोगों ने पुलिस पर भी हमला किया, जिसमें कई पुलिस कर्मी घायल हो गए थे।

बता दें कि 1 दिसंबर से सरकार और किसानों के बीच बातचीत का दौर शुरू हुआ। पहले दौर की बैठक के बाद एक के बाद एक 11 दौर की बातचीत सरकार और तकरीबन 40 किसान संगठनों के नेताओं के बीच हुई। अलग-अलग प्रस्तावों के बावजूद, किसान तीन कानून की वापसी और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून बनाने की मांग पर अड़े रहे। सरकार ने कानून को लगभग डेढ़ साल तक स्थगित करने तक का प्रस्ताव भी दिया, जिसे किसानों ने सर्वसम्मति से ठुकरा दिया।