रीवा के सुईया गांव में रविवार शाम को जो हुआ, वह महज एक हादसा नहीं बल्कि एक चेतावनी है। वर्षों पुराना भारी भरकम पीपल का पेड़ जैसे ही सड़क की ओर गिरा, उसके नीचे खड़े लोग और आइसक्रीम विक्रेता उसका पहला शिकार बने।
स्थानीय प्रशासन और ग्रामीणों के संयुक्त प्रयास से सभी 10 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया, लेकिन सवाल वही — क्यासवालों के नीचे दबा रीवा का पेड़ — क्या हमारी निगरानी तंत्र भी कमजोर हो गई है? पुराने पेड़ों की सुरक्षा जांच कोई ज़िम्मेदारी नहीं? पीपल का पेड़ गिरा, लेकिन इसके नीचे क्या सिर्फ 10 लोग दबे थे? या एक पूरी लापरवाह सिस्टम की पोल भी खुल गई?
सुईया गांव में रविवार की शाम जो हुआ, वह कहीं न कहीं प्रशासनिक निरीक्षण की असफलता की ओर भी इशारा करता है। क्या इस पेड़ की हालत पर किसी की नज़र थी? क्या कोई नगरपालिका अधिकारी कभी इसकी स्थिति का आकलन करने आया था?
गनीमत है कि जनहानि नहीं हुई, लेकिन हम कब तक किस्मत के भरोसे जिएंगे?
क्या यह हादसा टाला नहीं जा सकता था?