बीजेपी विधायक उषा ठाकुर का बयान कि "छांगुर बाबा जैसे लोगों के हाथ-पैर और प्रजनन अंग काट देने चाहिए", एक गंभीर बहस को जन्म देता है — क्या ऐसे बयान लोकतांत्रिक प्रणाली में स्वीकार्य हैं?
विधायक का क्रोध स्वाभाविक हो सकता है, किंतु जब कोई जनप्रतिनिधि संविधान से इतर सज़ा की मांग करे, तो यह जनतंत्र की जड़ों पर भी सवाल खड़े करता है। भारत का कानून अपराधियों को दंड देता है, प्रतिशोध नहीं। सवाल यह भी है कि क्या कानून से ऊपर उठकर शरीयत के अनुसार सज़ा की बात करना उचित है?
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“सजा का स्वरूप या लोकतंत्र का अधिष्ठान: क्या उषा ठाकुर की मांग संविधान से मेल खाती है?”