जबलपुर हाईकोर्ट और जिला न्यायालय में कथित फर्जी वकीलों का मकड़जाल? दस्तावेजों की जांच और कार्रवाई की उठी मांग।
MP- जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ और जिला न्यायालय परिसर में कथित रूप से फर्जी अथवा संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर वकालत किए जाने को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह न केवल न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर मामला है, बल्कि वास्तविक रूप से पंजीकृत अधिवक्ताओं और न्याय पाने के लिए अदालत पहुंचने वाले पक्षकारों के हितों पर भी सीधा असर डाल सकता है।
सूत्रों और अधिवक्ता समुदाय में चल रही चर्चाओं के अनुसार, कुछ ऐसे लोगों के संबंध में जांच की आवश्यकता महसूस की जा रही है, जिनकी कानूनी डिग्री, बार काउंसिल पंजीयन, एनरोलमेंट नंबर, प्रैक्टिस प्रमाण-पत्र तथा अन्य आवश्यक दस्तावेजों की वास्तविकता का सत्यापन किया जाना जरूरी है। हालांकि, संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर जांच आवश्यक है।
दस्तावेजों का हो स्वतंत्र सत्यापन
मामले की गंभीरता को देखते हुए मांग उठ रही है कि हाईकोर्ट और जिला न्यायालय परिसर में प्रैक्टिस करने वाले संदिग्ध अधिवक्ताओं के दस्तावेजों का मध्यप्रदेश स्टेट बार काउंसिल, संबंधित विश्वविद्यालय और अन्य सक्षम संस्थाओं से स्वतंत्र रूप से सत्यापन कराया जाए।
जांच में यह भी देखा जा सकता है कि संबंधित व्यक्ति का नाम बार काउंसिल के रिकॉर्ड में दर्ज है या नहीं, उसका एनरोलमेंट नंबर वास्तविक है या नहीं और उसके पास वैध रूप से न्यायालय में प्रैक्टिस करने की पात्रता है या नहीं।
फर्जीवाड़ा मिला तो हो सख्त कार्रवाई
यदि जांच में किसी व्यक्ति द्वारा फर्जी डिग्री, फर्जी एनरोलमेंट नंबर, जाली प्रमाण-पत्र अथवा अन्य कूटरचित दस्तावेजों का इस्तेमाल कर अधिवक्ता के रूप में प्रैक्टिस करने की पुष्टि होती है, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ बार काउंसिल की अनुशासनात्मक कार्रवाई के साथ-साथ लागू आपराधिक कानूनों के तहत भी कार्रवाई की जानी चाहिए।
साथ ही यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि ऐसे दस्तावेज तैयार कराने, उपलब्ध कराने या उनके सत्यापन में किसी स्तर पर मिलीभगत तो नहीं हुई।
पक्षकारों के हितों की भी हो जांच
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उन पक्षकारों के हितों से जुड़ा है, जिन्होंने ऐसे कथित अधिवक्ताओं पर भरोसा करके अपने मुकदमों की पैरवी सौंपी हो। यदि किसी व्यक्ति के फर्जी अधिवक्ता होने की पुष्टि होती है, तो उसके द्वारा पूर्व में की गई पैरवी से प्रभावित मामलों की भी नियमानुसार समीक्षा की आवश्यकता हो सकती है, ताकि किसी पक्षकार के साथ न्यायिक नुकसान न हो।
जांच से ही सामने आएगा सच
यह मामला किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखने का है। इसलिए संबंधित आरोपों की निष्पक्ष और रिकॉर्ड आधारित जांच जरूरी है। यदि आरोप निराधार हैं तो जांच से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई का रास्ता साफ होगा।
जबलपुर हाईकोर्ट एवं जिला न्यायालय प्रशासन, मध्यप्रदेश स्टेट बार काउंसिल और संबंधित जांच एजेंसियों से मांग है कि ऐसे सभी संदिग्ध मामलों की गंभीरता से जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाए।
