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रजिस्ट्री पर रोक: क्या कलेक्टर के पास है अधिकार? हाईकोर्ट के फैसलों से उठे सवाल

जबलपुर सहित प्रदेश के कई शहरों में प्रॉपर्टी बाजार पहले ही मंदी और खरीदारों की कमी से जूझ रहा है। ऐसे में रजिस्ट्री संबंधी प्रतिबंधों ने बाजार की गति और धीमी कर दी है। प्रॉपर्टी ब्रोकरों का कहना है कि उनकी पूरी आय कमीशन पर आधारित होती है और रजिस्ट्रियां रुकने से उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।



MP- जबलपुर| मध्य प्रदेश में संपत्तियों की रजिस्ट्री पर लगी रोक को लेकर एक बार फिर कानूनी बहस तेज हो गई है। प्रॉपर्टी कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि प्रशासनिक आदेशों के कारण हजारों खरीदार, विक्रेता और ब्रोकर प्रभावित हो रहे हैं। वहीं कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि केवल प्रशासनिक निर्देश के आधार पर रजिस्ट्री पर रोक लगाना हमेशा वैध नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि पंजीयन अधिकारी और प्रशासन अपनी वैधानिक सीमाओं के भीतर ही कार्य कर सकते हैं।


प्रॉपर्टी कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि जब किसी क्षेत्र या खसरे की रजिस्ट्रियां रोक दी जाती हैं तो सबसे अधिक असर आम नागरिकों और ब्रोकरों पर पड़ता है। कई खरीदारों की जमा पूंजी फंस जाती है, बैंक ऋण अटक जाते हैं और रियल एस्टेट बाजार में अनिश्चितता बढ़ जाती है।


कानूनी जानकारों के अनुसार पंजीयन अधिनियम के तहत सब-रजिस्ट्रार का दायित्व दस्तावेजों का पंजीयन करना है। केवल भूमि के स्वामित्व विवाद या किसी तीसरे पक्ष की आपत्ति के आधार पर रजिस्ट्री से इंकार नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसके लिए स्पष्ट कानूनी आधार या सक्षम न्यायालय का आदेश मौजूद न हो। हाल के एक मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी माना कि केवल टाइटल विवाद या आपत्ति के आधार पर रजिस्ट्री रोकी नहीं जा सकती।


विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भूमि सरकारी घोषित हो, अधिग्रहण की प्रक्रिया में हो, न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश जारी किया गया हो या किसी विशेष कानून के तहत प्रतिबंध लागू हो, तब प्रशासन कार्रवाई कर सकता है। लेकिन सामान्य प्रशासनिक आदेशों के आधार पर व्यापक स्तर पर रजिस्ट्रियां रोकने पर कानूनी प्रश्न खड़े होते हैं।


जबलपुर सहित प्रदेश के कई शहरों में प्रॉपर्टी बाजार पहले ही मंदी और खरीदारों की कमी से जूझ रहा है। ऐसे में रजिस्ट्री संबंधी प्रतिबंधों ने बाजार की गति और धीमी कर दी है। प्रॉपर्टी ब्रोकरों का कहना है कि उनकी पूरी आय कमीशन पर आधारित होती है और रजिस्ट्रियां रुकने से उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।


कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को भूमि विवादों के समाधान और राजस्व रिकॉर्ड के सत्यापन के लिए प्रभावी व्यवस्था बनानी चाहिए, लेकिन वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना संपत्ति लेन-देन पर रोक लगाने से नागरिकों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। अंतिम निर्णय प्रत्येक मामले की परिस्थितियों, संबंधित कानून और न्यायालय के आदेशों पर निर्भर करता है।